
फिल्म हनुमान अंश ने हिन्दी की प्रतिष्ठा में की श्री वृद्धि
लेख अशोक मनवानी, भोपाल
हनुमान अंश के कुछ संवाद अद्भुत हैं। वास्तव में पटकथा पर परिश्रम ही नहीं किया गया हिंदी की महिमा को बढ़ाने का कार्य भी अनायास हो गया है। वर्ष 2026 का हिन्दी दिवस सुखद अनुभूति करवा रहा है। हाल ही में चर्चित और लोकप्रिय हुई फिल्म हनुमान अंश के संवाद यही प्रमाण देते हैं। इस फिल्म का एक संवाद है कि “वस्तु, व्यक्ति या स्थान, किसी के साथ भी आसक्ति अच्छी नहीं है।”
हिंदी सिनेमा में यह शब्द इतने सशक्त ढंग से पहली बार सुनाई दिया है। सिने दर्शक इस बात से वाकिफ हैं कि 1980 के दशक में जरूर कुछ कला फिल्मों ने अच्छी हिन्दी प्रस्तुत की थी। फिर यह दौर थम सा गया था।
फिल्म हनुमान अंश के संवादों की बात करें तो जेल में डाल दिए गए बाबा का सिपाही से संवाद होता है। सिपाही कहता है “बाबा जी हमसे बड़ी गुस्ताखी हो गई हमने आपको चोर बदमाश समझ कर कैद कर लिया।” बाबा सहज भाव से कहते हैं “तुम्हारी कोई गलती नहीं है मुझे तो यहां रात काटने को मिल गई।”यह सहज भाव और सहज भाषा का उदाहरण है। इस फिल्म में हिन्दी की ताकत उभर कर सामने आई है।
इसी तरह पति-पत्नी संवाद में पत्नी कहती है कि “पूजा मेरे पिता भी करते हैं आपके पिता भी करते हैं, लेकिन इसके लिए बाकी सब लोगों को नहीं छोड़ देते” बाबा की बात भी जो पत्नी से कही गई बहुत प्रभावशाली है कि “एक पत्नी को प्रश्न पूछने का अधिकार तो होता ही है।” मन की भावनाओं को इतनी सरल और संप्रेषण में सक्षम हिन्दी में प्रस्तुत करना निर्देशकीय कौशल भी है। यह संवाद हृदय को छू लेता है। कहानी में
इस संवाद के पश्चात बाबा को कैंची धाम जाने के लिए पत्नी सहर्ष अनुमति दे देती है। बाबा अपने साथ सिर्फ एक गमछा एक कंबल और एक लोटा ही ले जाते हैं।अन्य संवादों की चर्चा करें तो
फिल्म में एक ये विशेष संवाद है “विषय नहीं ये शोध का, विषय है आत्म बोध का
वास्तव में यह फिल्म का एक बहुत प्रभावशाली संवाद है। हिन्दी के साथ ही आंचलिक बोली बुंदेली फिल्म में उभर कर आई है। भारत में भोजपुरी फिल्में बहुत बनी हैं। भाषाई सिनेमा का काफी विकास हुआ है। बड़े पर्दे पर बुंदेली का गौरव पहली बार प्रभावशाली ढंग से दिखाई दिया है।
मनुष्यता के पक्ष में सशक्त संदेश
फिल्म की चर्चा देश भर के टीवी चैनल्स, पत्र पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर काफी हो चुकी है । धार्मिक थीम से हटकर सोचें तो मनुष्यता और नैतिकता के अनेक संदेश भी देती है यह फिल्म। इसके लिए फिल्म में पर्याप्त उदाहरण शामिल किए गए हैं। एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के खेत से तरबूज चुरा कर ले जाने और फिर उसका जीवन दांव पर लग जाते दिखाना ऐसा ही उदाहरण है।
फिल्म में एक बहेलिया है। यह किरदार ऐसा है जो आज के समय में पशु पक्षियों को फंसाने की तरह मनुष्य द्वारा मनुष्य को फंसाने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है और जब बाबा नीम करोली वाले बहेलिया से पूछते हैं आज क्या फाँस लिया? तो हिन्दी का यह संवाद या सवाल समाज में मौजूद शिकारी प्रवृत्ति के व्यक्तियों पर कटाक्ष की तरह महसूस होता है। फिल्म में बाबा नीम करोली के जीवन के पक्षों को दिखाने के साथ ही कहानी के साथ एक अन्य समानांतर कथा चलती है जो सहज रूप से मानवता का संदेश भी देती है। सबसे बड़ी बात राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा हिन्दी सिनेमा में पुनः स्थापित होती दिख रही है। वरना हमारा हिन्दी सिनेमा अच्छी हिन्दी छोड़कर सब कुछ परोस रहा है।
अशोक मनवानी, भोपाल




