धर्म-संस्कृति

कल्पसूत्र  के श्रवण से कर्मरूपी व्याधि का क्षय होता है : मुनि प्रशमसेन विजयजी म.सा.

पर्युषण पर्व के षष्ठम दिवस कल्पसूत्र व्याख्यान संपन्न

पर्युषण पर्व के षष्ठम दिवस कल्पसूत्र व्याख्यान संपन्न

कल्पसूत्र  के श्रवण से कर्मरूपी व्याधि का क्षय होता है : मुनि प्रशमसेन विजयजी म.सा.

इंदौर।पर्युषण पर्व के पावन अवसर पर केसरी वाटिका में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत षष्ठम दिवस पंचम एवं सिस्टम व्याख्यान श्रद्धा एवं भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुनि प्रशांतसेन विजयजी म.सा. ने भगवान महावीर के जीवन, कल्पसूत्र के महत्त्व, धार्मिक संस्कारों तथा संघ के दायित्वों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला।

मीडिया समन्वयक राजेश जैन युवा ने बताया कि प्रवचन में कल्पसूत्र के श्रवण की महत्ता बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर के जीवन से संबंधित इस पावन ग्रंथ का श्रवण करने से कर्मरूपी व्याधि का क्षय होता है। यह ग्रंथ आत्मा को धर्ममार्ग की ओर प्रेरित करता है तथा जीवन में सदाचार, संयम और आध्यात्मिक जागृति का संचार करता है।

भगवान महावीर के जन्म वांचन प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि प्रभु के जन्मोत्सव के अवसर पर आनंद की वर्षा होती है। लगभग 2600 वर्षों के इतिहास में ऐसा प्रसंग कभी नहीं आया कि पर्युषण पर्व के पंचम दिवस प्रभु का जन्म हो और इंद्र महाराज उपस्थित न हों। कल भी इंद्र महाराज की कृपा रही। यह इस बात का प्रमाण है कि आज भी शासन जीवंत है और प्रभु महावीर की प्रभावना निरंतर हो रही है।

सरल भाषा में कल्पसूत्र की रचना का उद्देश्य

मुनिश्री ने कल्पसूत्र के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कल्पसूत्र की बालबोध टीका की रचना दादा गुरुदेव ने झाबुआ, मध्य प्रदेश में की थी। इससे पूर्व इसके गुजराती एवं संस्कृत संस्करण प्रचलित थे, किंतु दादा गुरुदेव ने सरल भाषा में इसकी रचना इसलिए की, ताकि सामान्य श्रावक भी इसके गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को सहजता से समझ सके और उसका लाभ अपने जीवन में ले सके।

उन्होंने बताया कि राजेंद्रसूरिजी महाराज, मोहनखेड़ा वाले, ने अपने जीवनकाल में 60 से अधिक बड़े ग्रंथों की रचना की। जब मालवा क्षेत्र में संघ का विस्तार होने लगा, तब पुण्यसम्राट जयंतसेनसूरिश्वरजी ने वर्ष 2055 में कुक्षी में इसका हिंदी अनुवाद किया। यह इतिहास आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचना चाहिए, ताकि वे अपने धर्म, ग्रंथों और गुरुपरंपरा के महत्त्व को समझ सकें।

संस्कार निर्माण में पाठशालाओं की भूमिका

मुनिश्री ने कहा कि यदि हमारे पास सामर्थ्य, प्रभाव या शक्ति है, तो उसका उपयोग दूसरों के जीवन से अज्ञान और अंधकार दूर करने में करना चाहिए। जब बच्चे विद्यालय में प्रवेश करें, तभी से उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक संस्कार देने का प्रयास होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में संघ को संस्कारी बनाना है, तो पाठशालाओं पर विशेष ध्यान देना पड़ेगा। हमारे आचार्यों और संतों के विचार यदि हम पढ़ लें, तो अनेक पापों से बच सकते हैं। धार्मिक शिक्षा केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि जीवन जीने की सही दिशा भी प्रदान करती है। जिनालय जाने की विधि, चैत्यवंदन और धार्मिक आचरण का संस्कार भी इसी प्रकार विकसित होता है।

श्रावक-श्राविका के धार्मिक दायित्व

प्रवचन में कहा गया कि श्रावक का पुण्य घर की देहरी के बाहर है और श्राविका का पुण्य घर के भीतर है। दोनों के अपने-अपने धार्मिक दायित्व हैं, जिन्हें समझकर मर्यादापूर्वक निभाना चाहिए।

दीक्षा के अवसर पर मुमुक्षु को वर्षीदान देने की परंपरा का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि वर्षीदान एक ही स्थान पर बैठकर देना चाहिए। बिना किसी आवश्यक कारण के पति-पत्नी के कक्ष भी अलग-अलग होना चाहिए। श्री स्तुति परंपरा में भी एक ही स्थान पर बैठकर मुमुक्षु को वर्षीदान देने की परंपरा रही है।

उन्होंने समझाया कि दान का उद्देश्य केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनय और धार्मिक भावना के साथ पुण्य का अर्जन करना है। वर्तमान समय में देखने में आता है कि प्रभावना कम और अवहेलना अधिक हो रही है। संघ की पूजा एवं प्रभावना करना भी प्रत्येक श्रावक-श्राविका का कर्तव्य है।

पाठशाला के बच्चों ने दी अद्भुत प्रस्तुति

प्रभु महावीर के पाठशाला गमन प्रसंग पर इंदौर की पाठशाला के बच्चों ने श्रीमती सपनाजी संघवी के नेतृत्व में धर्मसभा में अद्भुत प्रस्तुति दी। बच्चों की प्रस्तुति ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को भावविभोर कर दिया और धर्मसभा में विशेष उत्साह का वातावरण बना।

मुनिश्री ने अंत में आह्वान किया कि धर्म के प्रति श्रद्धा, गुरुवचनों के प्रति सम्मान, धार्मिक मर्यादाओं का पालन तथा आने वाली पीढ़ी को संस्कारित करने का संकल्प ही पर्युषण पर्व की सच्ची साधना है।

वरिष्ठ मुनिराज डॉ. सिद्धरत्न विजयजी ने क्रियाएं एवं तपस्वियों के पच्चखाण करवाए। कार्यक्रम का संचालन नीरज सुराणा ने किया तथा आभार संघ अध्यक्ष धनराज संघवी ने माना।

धर्मसभा का संचालन नीरज सुराणा ने संचालन किया तथा धनराज संघवी ने आभार व्यक्त किया।

विशेष रूप से उपस्थित धनराज संघवी, शांतिलाल जैन चेतना, संजय लुंकड, राजेंद्र रुणवाल, सुरेन्द्रकुमार सुराणा, विजय राठौर, नेरन्द्र राणापुर, प्रभात जैन घंटाघर, रमेश श्रीश्रीमाल, हीरालाल बाफना उपस्थित थे।

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