कर्मों से बचने के लिए जीवन में जयणा और सावधानी आवश्यक : मुनिराज डॉ. सिद्धरत्न विजयजी
नवकार महामंत्र की आराधना कठिन परिस्थितियों में देता है आत्मबल — मुनिश्री विद्वदरत्न विजयजी

कर्मों से बचने के लिए जीवन में जयणा और सावधानी आवश्यक : मुनिराज डॉ. सिद्धरत्न विजयजी
नवकार महामंत्र की आराधना कठिन परिस्थितियों में देता है आत्मबल — मुनिश्री विद्वदरत्न विजयजी
इंदौर। एयरपोर्ट रोड स्थित श्री केसरी वाटिका में आयोजित *गुरुराज स्पर्श चातुर्मास-2026* के अंतर्गत धर्मदिवाकर, हृदयसम्राट, सुविशाल गच्छाधिपति जैनाचार्य *श्रीमद् विजय नित्यसेनसूरीश्वरजी म.सा.* की पावन निश्रा में धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा में वरिष्ठ मुनिराज *डॉ. सिद्धरत्न विजयजी म.सा.* एवं मुनिश्री *विद्वदरत्न विजयजी म.सा.* ने धर्म, संयम, विनय एवं आत्मचिंतन पर प्रेरणाप्रद प्रवचन दिए।
वरिष्ठ मुनिराज डॉ. सिद्धरत्न विजयजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य को जीवन में प्राप्त सत्ता, संपत्ति और सुख का उपयोग धर्माराधना में करना चाहिए, विराधना में नहीं। किसी जीव को पीड़ा पहुंचाकर सुख प्राप्त करना अथवा असावधानीपूर्वक कार्य करना कर्मबंधन का कारण बनता है। इसलिए प्रत्येक कार्य *जयणा एवं सावधानीपूर्वक* करना चाहिए। उत्तराध्ययन सूत्र के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जिनशासन प्रत्येक क्षण सजग एवं सावधानीपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। आचार्य कुमारपाल जैसे धर्मनिष्ठ राजाओं के जीवन से जीवदया एवं प्राणीमात्र के प्रति संवेदनशीलता की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने भीमसेन के चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि लोभ के वशीभूत होकर मनुष्य कर्मों के बंधन में जकड़ जाता है। विपरीत परिस्थितियों में भी जिनेश्वर के उपासक को निराश नहीं होना चाहिए। सुख-दुःख का मूल कारण हमारे अपने कर्म हैं।
मुनिराज ने कहा कि कठिन समय में निराशा के स्थान पर *अरिहंत की शरण एवं नवकार महामंत्र की आराधना* को जीवन का आधार बनाना चाहिए। मृत्यु के समय भी मनुष्य के भाव अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। दान, धर्म, पूजा, सामायिक एवं सद्कार्यों के संस्कार आत्मा के लिए शुभ गति का कारण बनते हैं। उन्होंने रात्रि में सोने से पूर्व आत्मचिंतन करते हुए समस्त जीवों से क्षमायाचना और शुभ भावों का स्मरण करने की प्रेरणा दी।
*भीमसेन की नवकार आराधना* का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि चारों ओर से विपरीत परिस्थितियां आने पर भी श्रद्धा नहीं छोड़नी चाहिए। प्रबल श्रद्धा एवं भावपूर्ण प्रार्थना से शुभ भाव जागृत होते हैं। इसी भावना से भीमसेन ने नवकार महामंत्र का स्मरण किया और गुरुदेव के दर्शन की तीव्र भावना व्यक्त की।
गुरु वंदन की विधि पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि गुरु भगवंत के प्रति सदैव विनय एवं श्रद्धा रखनी चाहिए। यदि साधु-साध्वी भगवंत विश्राम, अध्ययन अथवा ध्यान में हों तो उनकी साधना में व्यवधान न डालते हुए उचित समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। *गुरु के प्रति विनय, श्रद्धा एवं आज्ञापालन ही सच्ची आराधना है।*
मुनिश्री विद्वदरत्न विजयजी म.सा. ने कहा कि जिनशासन की प्रभावना तभी सार्थक होती है, जब व्यक्ति अपने जीवन को देव, गुरु और धर्म की आज्ञा के अनुरूप ढालता है। तप, त्याग एवं समर्पण जीवन को सार्थक बनाते हैं। उन्होंने तपस्विनी *आशाबहन खाबिया* की तप आराधना की सराहना करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों एवं गर्मी के बावजूद तप स्वीकार कर उन्होंने श्रद्धा एवं समर्पण का परिचय दिया है। सच्चे प्रेम और समर्पण के सामने सांसारिक संपत्ति का मोह गौण हो जाता है। आय का सदुपयोग धर्म एवं सेवा में करने से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। राणापुर संघ के आगमन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पुण्यसम्राट से प्राप्त संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए *मिच्छामि दुक्कडम्* की भावना को जीवन में उतारना चाहिए। व्यक्ति के मन में यह भाव होना चाहिए कि *मेरा किसी से वैर नहीं, मैं किसी का दुश्मन नहीं और सभी जीवों से मिच्छामि दुक्कडम्।* उन्होंने कहा कि *गुरु की आज्ञा ही जीवन का मंत्र है।*
धर्मसभा में *राणापुर, मैसूर, नामली एवं उज्जैन* सहित अनेक स्थानों से गुरुभक्त उपस्थित हुए। साध्वी श्री दिव्यदृष्टाश्रीजी म.सा., साध्वी श्री चिरागकलाश्रीजी म.सा., साध्वी श्री पुनीतकलाश्रीजी म.सा., साध्वी श्री मौनदृष्टाश्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री पावनदृष्टाश्रीजी म.सा. की पावन निश्रा रही।
उज्जैन के मनोहरलालजी मिश्रीमलजी खाबिया द्वारा परमात्मा, मंगल दिवा, दादा गुरुदेव एवं पुण्य सम्राट की आरती की गई तथा आज की प्रभावना भी उनके द्वारा की गई। कार्यक्रम का संचालन *नीरज सुराणा* ने किया एवं आभार *नरेंद्र सुराणा* ने माना।
तप आराधना में *श्रीमती मुक्तिजी कपिलजी बरड़िया जैन एवं श्रीमती बुलबुलजी अंकितजी मेहता ने 23-23 उपवास* की आराधना की। साथ ही दो मासक्षमण सहित कुल तीन मासक्षमण की आराधना चल रही है।
बहुमान के लाभार्थी *नीरजकुमारजी भेरूलालजी नितिनजी जशजी सुराणा, विंध्यांचल नगर* द्वारा चन्द्रसेनजी कटारिया राणापुर, प्रकाशजी मेहता नामली, अरविन्दजी भंडारी मैसूर एवं मनोहरलालजी खाबिया उज्जैन का बहुमान किया गया।
जयन्तीलालजी संघवी, अंतिमजी बागवाला, विशालजी बागवाला, सुनीलकुमारजी बांठिया रिंगनोदवाले, ज्ञानचंद्रजी बोहरा, पंकज पारेख, दिलीप बोहरा सहित सैकड़ों गुरुभक्त उपस्थित रहे। संघ अध्यक्ष *धनराज संघवी* एवं *चंद्रशेखरजी कटारिया* की ओर से उद्बोधन एवं क्षमायाचना की गई।

विशेष :- एक सत्य घटना है कि दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेंद्रसूरीश्वरजी महाराज मांगी-तुंगी के पहाड़ पर सिद्धचक्र तप अट्ठाई में लीन थे। तभी जंगल से एक सिंह आया और सीधे आकर उनके चरणों में झुक गया, परिक्रमा की और चुपचाप वापस जंगल में चला गया। वर्तमान में दादा गुरुदेव के जन्म का 200वाँ वर्ष चल रहा है। इसी को भेंट चढ़ाने हेतु तपस्विनी श्रीमती आशाजी मनोहरलालजी खाबिया उज्जैन द्वारा राजेंद्रसूरी सिद्धचक्र तप किया गया। इसके अंतर्गत गर्म पानी के आधार पर 8 दिन का उपवास एवं पारणा, ऐसे 8 अट्ठाई की गईं। गर्म पानी के आधार पर 72 दिनों तक चले इस तप में कुल 64 दिन के उपवास हुए। वर्तमान गच्छाधिपति के उपदेश एवं निश्रा में इस तप का पारणा आज श्री केसरी वाटिका में संपन्न हुआ। राजमलजी चोपड़ा की पुत्री एवं श्री मिश्रीलालजी खाबिया की पुत्रवधु, उज्जैन निवासी, वर्ष 1962 में जन्मी तपस्विनी श्रीमती आशाजी खाबिया पूर्व में श्रेणी तप, 2 सिद्धि तप, निगोद तप, 3 वर्षीतप आदि अनेक तपस्याएं कर चुकी हैं। आज धर्मसभा में श्रीमती सुषमाजी एवं जया सुराणा द्वारा तपस्विनी का बहुमान किया गया। पूज्य गुरुदेव ने अपने कर-कमलों से उन्हें भेंट प्रदान की।




