पूजा, व्रत, नियम और स्वाध्याय के साथ आत्मचिंतन भी जरुरी-राष्ट्रसंत सुधासागर
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति

पूजा, व्रत, नियम और स्वाध्याय के साथ आत्मचिंतन भी जरुरी-राष्ट्रसंत सुधासागर
सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग में चल रही चातुर्मास की धर्मसभा में आशीर्वचन
इंदौर। धर्म केवल कर्मकांड नहीं बल्कि अपनी भावना, सोच और दृष्टि बदलने का माध्यम है। हमारा प्रत्येक धार्मिक कार्य हमें आत्म कल्याण, वैराग्य और मोक्ष मार्ग की दिशा में कितना प्रेरित कर रहा है, इसपर भी हमें चिन्तन और विचार करना चाहिए। संसार में रहकर संसार के प्रति आसक्ति को कम करना और आत्मा की उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करना ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। पूजा, व्रत, नियम और स्वाध्याय के साथ आत्म चिंतन भी जरुरी है।
ये प्रेरक और दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में छत्रपति नगर स्थित, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव की धर्मसभा में बुधवार को सुबह व्यक्त किए। सभा का शुभारंभ मंगलाचरण एवं पाद प्रक्षालन के साथ हुआ। प्रारम्भ में आयोजन समिति की ओर से चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन-शिवानी गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद-अंतिका गोधा, चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, अध्यक्ष अशोक डोसी, महामंत्री हर्ष-तृप्ति जैन, आकाश जैन कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, सौरभ बडजात्या, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली आदि ने साधकों की अगवानी की। धर्मसभा में राष्ट्रसंत के प्रवचनों की अमृत वर्षा सुबह 8 से 9.30 बजे तक नियमितरूप से जारी है।
राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. ने कहा कि जब हमें कहीं जाना होता है तो हम बड़ी कठिनाई से अपनी सीट प्राप्त करने हैं लेकिन जब हमारा स्टेशन आ जाता है तो हम उसी सीट को छोड़कर उतरने की तयारी में लग जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य पर्याय प्राप्त करने में अनेक पुण्य और प्रयास करता है। माता-पिता, परिवार, धन-सम्पत्ति और जीवन की अनेक सुख-सुविधाएँ भी उसे प्राप्त होती है फिर भी धर्म हमें यह चिंतन सिखाता है कि इन सबमें आसक्त होकर हम अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं भूलें। हमें आत्म चिंतन अवश्य करना चाहिए कि क्या हमारा धर्म केवल संसारी सुख सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए ही है, क्या मंदिर जाने, पूजा करने, जाप करने और स्वाध्याय करने से हमारे भीतर वैराग्य एवं आत्म कल्याण की भावना जागृत हो रही है, क्या हम केवल वर्तमान जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं या संसार के बन्धनों से मुक्त होने का मार्ग भी खोज रहे हैं?




