सनातन भव्य हो रहा है तो हमें खुश होना चाहिए न कि निंदा करनी चाहिए- इन्द्रेश महाराज
पूतना वध का प्रसंग भक्ति के साथ जीवन को सही दिशा देने का संदेश भी देता है।

सनातन भव्य हो रहा है तो हमें खुश होना चाहिए न कि निंदा करनी चाहिए- इन्द्रेश महाराज
इंदौर की ये कथा त्यौहार बन गई है*
छठे दिन पूतना वध की लीला का वर्णन, श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और ब्रज के वात्सल्य भाव की चर्चा
इंदौर। सनातन भव्य हो रहा है तो हमें खुश होना चाहिए न कि निंदा करनी चाहिए। इतनी भव्य कथा का आयोजन किसी विवाह समारोह से कम नहीं होता लेकिन कथा में आमंत्रितों के साथ ही निमंत्रितों को भी बुलाया जाता है और ऐसे आयोजन में छोटी मोटी अव्यवस्थाओं को नजर अंदाज करना जरूरी है। अब कथाएं भव्य हो रही है और सफल हो रही है अब तो सात अजूबों जैसे कथाएं होनी चाहिए जिसकी भव्यता का रिकॉर्ड बने और इंदौर वालों ने भी इतनी सुंदर कथा का रिकॉर्ड बनाया है। श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन इन्द्रेश जी महाराज ने कहा मैने मोबाइल पे देखा पंडाल में सुबह 9 बजे से रस लीला में झूमते लोगों के भी क्या कहने है आज कोई भी खाली नहीं है लेकिन सात दिनों तक लोगों ने कैसे अपने आप को कथा में समर्पित किया ये देख मुझे लग रहा अब इंदौर की ये कथा सिर्फ कथा नहीं रही त्यौहार बन गई है। कथा के छठवें दिन 56 भोग सजाया गया। महाराज ने पूजन के बाद ठाकुरजी को भोग लगाया। जय राधे राधे श्री राधे राधे भजन से महाराज ने कथा की शुरुआत की।
*मेरा भी पहला करवाचौथ है
यजमान आशीष गोयल ने बताया कथा के समापन के पूर्व ये आखरी संध्या थी परिवार के साथ ही समस्त भक्तगण भी भावुक थे। आयोजन को सफल बनाने वाली सभी साथियों का महाराज ने सम्मान किया। आयोजक अमृता गोयल ने बताया कि जैसे सभी को पता हैं महाराज कें लालजी उनके साथ हर जगह नहीं जाते है। महाराज उनके लिए चिट्ठी डालते हैं और इस तरह उनके कथा में साथ आने का योग बनता है। ये हमारा सौभाग्य है कि लालजी इंदौर आए बुधवार को लालजी के लिए छप्पन भोग तैयार किया गया है वे गुरुवार को अपने घर जा रहे है इस लिए उनको बहुत अच्छा भोजन पान करवा के भेजा जाएगा।
श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उत्सव सुनाया
श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में छठी उत्सव और पूतना वध का प्रसंग भक्ति के साथ जीवन को सही दिशा देने का संदेश भी देता है। महाराज ने नंद भवन में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उत्सव, ब्रजवासियों के उल्लास और पूतना वध की लीला का वर्णन किया। उन्होंने समझाया कि भगवान के लिए केवल बाहरी सुंदरता और शारीरिक स्वच्छता ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मन और बुद्धि की पवित्रता भी जरूरी है। दूसरों के प्रति छल, द्वेष और बिना पूरी जानकारी के निंदा करने से बचना चाहिए।
*मन की अपवित्रता दूसरों की निंदा करने से बढ़ती है*
इन्द्रेश जी महाराज ने पूतना के प्रसंग के माध्यम से कहा कि मनुष्य अक्सर दूसरों के दोष देखने और उनकी चर्चा करने में समय बिताता है। बिना सच्चाई जाने किसी के बारे में गलत बोलना मन और बुद्धि की पवित्रता को प्रभावित करता है। शारीरिक स्वच्छता के साथ विचारों की स्वच्छता पर भी ध्यान देना चाहिए। किसी की गलती सामने आने पर भी उसके पीछे की परिस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिए। भगवान का स्वभाव अपने भक्तों की गलतियों को क्षमा करना है, इसलिए मनुष्य को भी अपने व्यवहार में क्षमा और संवेदनशीलता रखनी चाहिए।
*सुंदर रूप देखकर ब्रजवासियों ने पूतना को नहीं रोका*
पूतना वध की लीला का वर्णन करते हुए महाराज ने बताया कि पूतना सुंदर रूप और आकर्षक श्रृंगार करके नंद भवन पहुंची थी। उसके रूप से प्रभावित होकर ब्रजवासियों ने उसे रोकने का प्रयास नहीं किया। यशोदा मैया ने भी उसे बालक श्रीकृष्ण को गोद में लेने दिया, लेकिन भगवान ने उसके वास्तविक उद्देश्य को पहचान लिया। पूतना ने जैसे ही श्रीकृष्ण को स्तनपान कराने का प्रयास किया, भगवान ने उसके प्राण हर लिए। इस प्रसंग के माध्यम से बताया गया कि बाहरी सुंदरता से दुनिया को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन भगवान के सामने मन के भाव महत्वपूर्ण होते हैं।
*भक्ति और सत्संग में व्यवधान पैदा करना भी गलत*
महाराज ने कहा कि जब कोई व्यक्ति भजन, कथा या सत्संग में मन लगाकर बैठा हो, तब उसके ध्यान में अनावश्यक व्यवधान पैदा नहीं करना चाहिए। दूसरों की आस्था और साधना का सम्मान करना भी भक्ति का हिस्सा है। मनुष्य को अपने आचरण पर ध्यान देना चाहिए और ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए, जिससे दूसरे की साधना में बाधा पहुंचे।
*ब्रजवासियों ने गायों के बीच कराया बाल गोपाल का दर्शन*
कथा में पूतना वध के बाद ब्रजवासियों की चिंता और बाल गोपाल के प्रति उनके प्रेम का भी वर्णन किया गया। पूतना के विशाल रूप में गिरने के बाद ब्रजवासी श्रीकृष्ण को देखने के लिए पहुंचे। बाल गोपाल को सुरक्षित देखकर सभी ने राहत महसूस की। इसके बाद गायों के बीच श्रीकृष्ण के दर्शन और गायों के स्पर्श से बालक की रक्षा करने का प्रसंग सुनाया गया। महाराज ने गायों के प्रति सम्मान और उनके संरक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
*श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में वात्सल्य और सरलता का वर्णन*
कथा में यशोदा मैया और बाल गोपाल के वात्सल्य से जुड़े प्रसंग भी सुनाए गए। श्रीकृष्ण के धीरे-धीरे चलना सीखने, तोतली बोली में शब्द बोलने और ब्रजवासियों के साथ उनकी बाल सुलभ लीलाओं का वर्णन किया गया। महाराज ने कहा कि बालक की सहजता, सरलता और निष्कपटता से मनुष्य को सीख लेनी चाहिए। उम्र बढ़ने के साथ मनुष्य छोटी-छोटी बातों में खुशियां खोजना भूल जाता है, जबकि बालक सहज ही आनंद खोज लेता है।




