वन घास बीड़ की बेशकीमती जमीन पर सड़क उखाड़ी, अब दोषियों पर कार्रवाई कब? जांच कर आँच कैसी।
दो सप्ताह बाद भी पीओआर दर्ज नहीं, विभाग की कार्रवाई पर सवाल जांच की जिम्मेदारी को लेकर भी उठ रहीं उंगलियां

आशीष यादव धार।
पीथमपुर क्षेत्र में करोड़ों रुपए की बेशकीमती वन घास बीड़ भूमि पर सड़क निर्माण का मामला अब वन
विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर रहा है। वन भूमि पर सड़क निर्माण कैसे हो गया, किसकी अनुमति से काम शुरू हुआ और जब निर्माण हो रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अब तक सामने नहीं आया है। शिकायत मिलने के बाद वन विभाग का अमला अगले ही दिन मौके पर पहुंचा और आनन-फानन में बनाई गई सड़क को उखाड़कर अपनी कार्रवाई जरूर दिखा दी, लेकिन असली सवाल सड़क हटाने के बाद शुरू होता है। जिस भूमि पर कथित तौर पर अतिक्रमण कर सड़क बना दी गई, वहां निर्माण करने वालों की जवाबदेही आखिर कौन तय करेगा? हैरानी की बात यह है कि सड़क हटाए दो सप्ताह बीतने को है, लेकिन जिम्मेदारों के खिलाफ वन अपराध प्रकरण (पीओआर) दर्ज होने की जानकारी सामने नहीं आई है। इंदौर में जिस प्रकार से सीसीएफ कार्रवाई कर रहे हैं। क्या अब धार में कार्रवाई के लिए आदेशित करेंगे साहब। क्या वन भूमि पर अवैध निर्माण करने वालों के लिए सड़क उखाड़ देना ही पर्याप्त कार्रवाई है? क्या सरकारी जमीन को नुकसान पहुंचाने वालों की जिम्मेदारी तय किए बिना मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। यदि वन भूमि पर हुए निर्माण को विभाग ने गंभीर उल्लंघन माना है, तो फिर कथित अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। कार्रवाई सिर्फ सड़क उखाड़ने तक सीमित रहेगी या बेशकीमती वन भूमि पर निर्माण करने वालों को कानून के दायरे में लाकर जवाबदेही भी तय की जाएगी? फिलहाल, सड़क हटने के बाद भी कार्रवाई को लेकर बना असमंजस वन विभाग की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
सावालों के गहरे में जिम्मेदार:
मामले को लेकर चर्चा है कि जांच की जिम्मेदारी प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारी को सौंपी गई है। हालांकि,जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, क्योंकि संबंधित बीट और रेंज में पदस्थ वन अधिकारी-कर्मचारियों की निगरानी व्यवस्था भी इस प्रकरण के दायरे में है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सड़क निर्माण जैसी गतिविधि लंबे समय तक कैसे चलती रही और इसकी जानकारी विभाग को पहले क्यों नहीं मिली, इसकी भी जांच होनी चाहिए।

शिकायतकर्ता के अनुसार,मामले की शिकायत मुख्यमंत्री, लोकायुक्त,धार डीएफओ और इंदौर वनवृत्त के सीसीएफ पीएन मिश्रा से की गई है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि जांच में क्या सामने आता है और जिम्मेदारी तय करने के लिए विभाग क्या कदम उठाता है। लकड़ी परिवहन और आरा मशीनों पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने पीथमपुर क्षेत्र में अवैध लकड़ी परिवहन और वन अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के आरोप भी लगाए हैं। उनका दावा है कि क्षेत्र में रोजाना बड़ी संख्या में लकड़ी से भरे वाहन पहुंचते हैं। कुछ आरा मशीनों के दस्तावेजों में बंद होने के बावजूद संचालन की चर्चा भी है।
इन आरोपों के बीच इंदौर वनवृत्त में पहले भी लकड़ी परिवहन से जुड़े मामलों में कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में वन घास बीड़ भूमि पर सड़क निर्माण का मामला केवल सड़क हटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सड़क उखाड़ना तात्कालिक कार्रवाई है, लेकिन वन भूमि को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान, वन अपराध प्रकरण दर्ज करने और निगरानी में लापरवाही की जांच से ही कार्रवाई पूरी मानी जाएगी।
कब होगी जिम्मेदारों पर कार्रवाई?
करोड़ों रुपए की वन भूमि पर सड़क बन गई और विभाग के जिम्मेदारों को भनक तक नहीं लगी। सवाल है कि संबंधित रेंज के बीट गार्ड,डिप्टी रेंजर और रेंजर क्या कर रहे थे? यदि तीन महीने तक सड़क बनती रही तो निगरानी तंत्र कहां था? शिकायत पर सड़क उखाड़ना ही काफी है या लापरवाही के लिए जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई होगी? अब देखना है कि विभाग दोषियों पर कार्रवाई करता है या मामला जांच तक ही सीमित रहता है।
चांदी काटने के बाद कार्रवाई से बच रहे अधिकारी?
चर्चा है कि कथित तौर पर चांदी काटने की बात कही जा रही है। वन विभाग सड़क निर्माण करने वाले अतिक्रमणकारी पर कार्रवाई करने से कतरा रहा है। बताया जा रहा है कि संबंधित व्यक्ति कार्रवाई होने पर उन अधिकारियों के नाम उजागर करने की बात कह रहा है, जिन्होंने उससे कथित तौर पर चांदी काटी गई। अब सवाल यह है कि विभाग निष्पक्ष कार्रवाई करेगा या आरोपों के सामने अधिकारी पीछे हटेंगे? मामले में निष्पक्ष जांच जरूरी है।




