रबी सीजन में 40 प्रतिशत जमीन खाली रहने का अनुमान गेहूं का रकबा 52 हजार हेक्टेयर कम…
चना और कम पानी में पकने वाली फसलों की ओर किसानों का रुख, गेहूं की बोवनी भी सिर्फ घर की जरूरत पूरी करने तक सीमित रखने की तैयारी।

आशीष यादव धार
इस बार कम बारिश का असर अब रबी सीजन की खेती पर साफ दिखाई देने लगा है। खरीफ फसलों के बाद अब रबी की बोवनी को लेकर भी किसानों की चिंता बढ़ गई है। जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होने, कुओं और नलकूपों का जलस्तर गिरने तथा सिंचाई के लिए पानी की कमी के चलते किसानों की चिंता बढ़ा दी हैे।।इस बार किसान बड़े रकबे में गेहूं की खेती करने से बच रहे हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि जिले में इस बार करीब 30 प्रतिशत कृषि भूमि खाली रह सकती है। जिन खेतों में बोवनी होगी, वहां भी किसान फसल का चयन पानी की उपलब्धता देखकर करेंगे। गेहूं की व्यावसायिक खेती के बजाय कई किसान सिर्फ परिवार के खाने की जरूरत पूरी करने लायक गेहूं बोने की तैयारी में हैं। वहीं चना और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख बढ़ रहा है।

बारिश की कमी ने बिगाड़ा खेती का गणित:
इस साल मानसून की बेरुखी ने जिले के कृषि का गणित बिगाड़ कर रख दया है। बारिश कम होने के कारण खेतों में नमी की कमी है और सिंचाई के परंपरागत स्रोतों पर भी दबाव बढ़ गया है। रबी सीजन में गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए समय पर पानी देना जरूरी होता है। पहली सिंचाई से लेकर आगे की अवस्थाओं तक पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर उत्पादन प्रभावित होने का खतरा रहता है। यही वजह है कि किसान इस बार गेहूं का रकबा बढ़ाने के बजाय सीमित रखने पर विचार कर रहे हैं। अभी सिंचाई के वक्त ही अधिकांश बोरिंग बंद हो गए हैं।
चना बनेगा किसानों का विकल्प:
पानी की कमी के बीच चना किसानों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है। गेहूं की तुलना में चने में सिंचाई की जरूरत सामान्यतः कम होती है। हालांकि इसकी पैदावार भी मिट्टी की नमी, मौसम और उपलब्ध पानी पर निर्भर करेगी। किसान ऐसे खेतों में चने की बोवनी को प्राथमिकता दे सकते हैं, जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है। इसके अलावा कम पानी में तैयार होने वाली दूसरी फसलों पर भी विचार किया जा रहा है। किसानों को आने वाले दिनों में मावटे की बारिश की भी उम्मीद है जिसके कारण चने की फसल पर दावा खेल रहे हैं।
घर गेहूं, बाजार के लिए चने पर जोर:
सामान्य वर्षों में किसान गेहूं की खेती से घरेलू जरूरत पूरी करने के साथ बाजार में बिक्री कर अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद रखते हैं। लेकिन इस बार पानी की उपलब्धता कम होने के कारण इस बार किसने की व्यवस्था ही बिगाड़ दी है। किसान जोखिम कम करने के लिए गेहूं का रकबा घटाकर परिवार की जरूरत के अनुसार बोवनी कर सकते हैं। बची हुई जमीन पर चना या अन्य कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
कम पानी में पकने वाली किस्मों की सलाह
कृषि विभाग सहायक संचालक संगीता तोमर ने बताया केि इस बार किसानों को सलाह दी है कि कम पानी और कम अवधि वाली किस्मों का चयन करें और सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर व ड्रिप पद्धति अपनाएं। गेहूं की एचआई 1544, एचआई 1500, एचडी 2987 किस्म 2 से 3 पानी में तैयार हो जाती है। चना में पूसा मानव, आईपीसीएम 19-3, विशाल, जेजी 11 की किस्में कम अवधि की है। सरसों व मसूर की उन्नत किस्में भी लगा सकते हैं।
खाली खेतों का असर उत्पादन और आमदनी पर:
यदि करीब 30 से 40 प्रतिशत कृषि भूमि पर रबी की बोवनी नहीं हो पाती है, तो इसका असर जिले के कुल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है। खेती से जुड़े मजदूरों को भी काम कम मिलने की आशंका रहेगी। वहीं गेहूं और अन्य फसलों के उत्पादन में संभावित कमी का असर कृषि आधारित कारोबार पर भी पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक स्थिति बोवनी के समय होने वाली बारिश, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता और किसानों के अंतिम फसल चयन के बाद ही स्पष्ट होगी।
बारिश कम फिर भी सूखा घषित नहीं:
इस बार बारिश कम होने के बाद भी जिला को सूखा घोषित से दूर रखा गया हैं। पूरे सीजन में औसत 33 इंच के मुकाबले मात्र 19.4 इंच पानी ही बरसा है। 13.4 इंच के इस भारी जल घाटे के कारण सिंचाई के लिए पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। कम बारिश और घटते जलस्तर का सीधा असर खेतों की बोवनी पर दिख रहा है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अधिक पानी की खपत वाली गेहूं की फसल के रकबे में 52 हजार हेक्टेयर की सीधी कमी आई है। किसान अब कम पानी में पकने वाली दलहन-तिलहन फसलों को तवज्जो दे रहे हैं, जिससे चने का दायरा 30,148 हेक्टेयर बढ़ा है। वहीं वैकल्पिक खेती के रूप में जिले में 3,500 हेक्टेयर चियासीड लगाने ओर चना 95 हजार में का लक्ष्य रखा गया है।
रबी की फसलो का रकबा:
फसल रकबा
गेंहू 2 लाख 90 हजार हेक्टयर
चना 95 हजार हेक्टयर
मटर 3 हजार हेक्टयर
मक्का 35 हजार हेक्टयर
गन्ना 1 हजार 500 हेक्टेयर
उघानीकी 40 हजार हेक्टेयर




