3 टन खैर पकड़ी, वन अमले ने जान जोखिम में डाली; फिर मुचलके पर छूटे आरोपी, विभाग की कार्रवाई पर सवाल।
तिरपाल हटाए तो निकाल खैर का काला खेल पीछा कर करने पर वन अमले की गाड़ी पलटाने की कोशिश

3 टन खैर पकड़ी, वन अमले ने जान जोखिम में डाली; फिर मुचलके पर छूटे आरोपी, विभाग की कार्रवाई पर सवाल
तिरपाल हटाए तो निकाल खैर का काला खेल पीछा कर करने पर वन अमले की गाड़ी पलटाने की कोशि
आशीष यादव धार।
जंगल की बेशकीमती खैर की लकड़ी की तस्करी रोकने के लिए वन विभाग के कर्मचारियों ने रात के अंधेरे में जान जोखिम में डालकर कार्रवाई की। करीब 3 टन खैर की लकड़ी से भरी पिकअप का पीछा करते हुए वन अमले की गाड़ी को टक्कर मारकर पलटाने की कोशिश तक की गई। इसके बावजूद टीम पीछे नहीं हटी और वाहन को पकड़ लिया। दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया,जबकि दो मौके से फरार हो गए। कार्रवाई के दौरान तिरपाल हटाया गया तो पिकअप में करीब 3 टन खैर की लकड़ी मिली। वाहन से दो अलग-अलग नंबर प्लेट मिलने से मामला और संदिग्ध हो गया। वन विभाग ने वाहन और लकड़ी जब्त कर ली तथा वन अपराध दर्ज किया।

लेकिन कार्रवाई के अगले चरण ने ही कई सवाल खड़े कर दिए। विभागीय सूत्रों के अनुसार,जिन आरोपियों को वनकर्मियों ने इतनी मशक्कत के बाद पकड़ा,उन्हें बाद में मुचलके पर छोड़ दिया गया। कर्मचारियों में दबी जुबान चर्चा है कि आरोपियों को कम से कम एक दिन हिरासत में रखा जाता तो वन माफिया को सख्ती का संदेश जाता। उनका कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में खैर की लकड़ी पकड़ने और आरोपियों को छोड़ दिए जाने से तस्करों के हौसले बढ़ सकते हैं।
वन अमले के कर्मचारियों का सवाल है कि जब कार्रवाई के दौरान हमला करने और वाहन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप सामने आए, साथ ही वाहन से दो नंबर प्लेट मिलीं, तो मामले में और सख्ती क्यों नहीं दिखाई गई? क्या आरोपियों से पूछताछ कर उस नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास हुआ,जहां से खैर की कटाई, परिवहन और खरीदी-बिक्री संचालित होती है?
कर्मचारियों की मेहनत पर कार्रवाई का अगला कदम भारी
रात 3 बजे सूचना मिलने के बाद उड़नदस्ता टीम ने संदिग्ध वाहन का पीछा किया। आरोप है कि चालक ने वन अमले की गाड़ी को टक्कर मारकर पलटाने का प्रयास किया। उड़नदस्ता प्रभारी राजेंद्र राठौर बाल-बाल बचे। इसके बाद भी टीम ने पीछा जारी रखा और पिकअप को रोक लिया। वन विभाग के अनुसार, वाहन में सवार लोगों ने टीम के साथ हाथापाई और हमला करने की कोशिश भी की। टीम ने दो आरोपियों—जावेद शेख निवासी नीमच और शादाब खान निवासी रतलाम—को पकड़ लिया, जबकि दो अन्य फरार हो गए।
अब सवाल यह है कि जिन कर्मचारियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर वन माफिया का वाहन पकड़ा,उनके प्रयास का असर आरोपियों को जल्दी छोड़ने से कमजोर तो नहीं पड़ गया?
दो नंबर प्लेट का राज भी अहम
पिकअप से दो नंबर प्लेट मिलने के बाद जांच का दायरा और बढ़ गया है। यदि इनमें से किसी नंबर प्लेट के फर्जी होने की पुष्टि होती है तो यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि इसका इस्तेमाल कब, कहां और किस उद्देश्य से किया गया। प्रारंभिक पूछताछ में खैर की लकड़ी हरदा जिले के खिरकिया क्षेत्र से भरकर लाने और बड़नगर की ओर ले जाने की बात सामने आई है। हालांकि लकड़ी जंगल से किसने कटवाई, किसके इशारे पर कटाई हुई, पिकअप में किसने भरवाई और इसका असली खरीदार कौन है—इन सवालों के जवाब जांच में सामने आना बाकी हैं।
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सीसीएफ से मांगा जवाब,नहीं आया कोई जवाब
मामले को लेकर सीसीएफ पीएन मिश्रा से उनके वाट्सएप पर संदेश भेजकर आरोपियों को मुचलके पर छोड़े जाने और पूरे मामले में विभाग की कार्रवाई का पक्ष जानने का प्रयास किया गया। खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
सीसीएफ की ओर से जवाब नहीं आने के कारण अब यह सवाल भी उठ रहा है कि इतने गंभीर वन अपराध में आरोपियों को मुचलके पर छोड़ने के निर्णय की निगरानी किस स्तर पर हुई और क्या वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी पूरी जानकारी थी। विभागीय जांच में यदि निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट होती है तो यह भी सामने आना चाहिए कि आरोपियों को किस आधार पर छोड़ा गया।
अब जांच की निष्पक्षता पर नजर
डीएफओ धार विजयनंथम टीआर के अनुसार, उड़नदस्ता एवं वन परिक्षेत्र की संयुक्त टीम ने कार्रवाई कर दो आरोपियों को पकड़ा और करीब 3 टन खैर की लकड़ी जब्त की है। वन अपराध दर्ज कर कार्रवाई जारी है। लकड़ी की कीमत करीब डेढ़ लाख और वाहन की कीमत करीब चार से पांच लाख रुपए आंकी गई है। उन्होंने बड़े नेटवर्क की आशंका जताते हुए रिमांड के दौरान पूछताछ की बात कही है। फर्जी नंबर प्लेट की पुष्टि होने पर आरटीओ को पत्राचार करने की बात भी कही गई है।
अब असली परीक्षा आगे होने वाली जांच की है। क्या जांच सिर्फ पिकअप और दो आरोपियों तक सीमित रहेगी या खैर की कटाई से लेकर खरीदार तक पूरा नेटवर्क सामने आएगा? क्या फरार आरोपियों को पकड़ा जाएगा? दो नंबर प्लेटों का राज खुलेगा? और सबसे अहम—जिन आरोपियों को वन अमले ने जोखिम उठाकर पकड़ा, उन्हें मुचलके पर छोड़ने के फैसले की भी निष्पक्ष समीक्षा होगी या नहीं?
इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि धार में खैर तस्करी के खिलाफ वन विभाग की कार्रवाई वास्तव में कितनी सख्त और निष्पक्ष है।


